Friday, January 7, 2011

वासना का भावना में रूपांतरण...-II

ऐसे में काम की समस्या का समाधान क्या हो ? इसका समाधान आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने खोजा था . उन्होंने स्पष्ट किया था की धर्म के अनुकूल आचरण करके कामवासना पर नियंत्रण किया जा सकता है . धर्म के विरुद्ध आचरण करने पर ही काम एक गंभीर समस्या बनता है . अतः मर्यादा,निति,संयम एवं प्रकृति को ध्यान में रखकर ही कामवासना में प्रवृत्त होना चाहिए I वे कहते हैं (भगवान श्री कृष्ण)- 'प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः'( गीता १०/२८ ) अर्थात शास्त्रोक्त रीति से संतान की उत्पत्ति हेतु मैं कामदेव हूँ . काम का प्रयोग न हो तो सृष्टि की प्रक्रिया ही अवरुद्ध हो जाएगी . अतः महायोगी श्री कृष्ण कहते हैं की इसका प्रयोग उच्छ्रिन्खल भोग के लिए नहीं है , बल्कि संयम एवं धर्माचरण के द्वारा संतान की उत्पत्ति में निहित है .

Friday, September 3, 2010

वासना का भावना में रूपांतरण... - I

'काम' इन्सान को शैतान भी बनाता है और देवता के रूप में भी गढ़ सकता है . भावना जब अधःपतित होती है तो वह कामवासना बन जाती है . उच्छ्रिन्खल कामवासना ही इन्सान को शैतान बनाती है और वह पशुतुल्य बन जाता है तथा मर्यादा की सारी सीमाएं लाँघ जाता है, जबकि भावना की परिष्कृति प्रार्थना के रूप में परिवर्तित होती है, भक्ति एवं प्रेम के रूप में सुवासित होती है और इन्सान को दिव्यत्व एवं देवत्व प्रदान करती है. कमवासना को नष्ट नहीं किया जा सकता है. जब तक देह है, इसका अस्तित्व बना ही रहता है, परन्तु इसका नियंत्रण एवं रूपांतरण संभव है .
सदियों से कामवासना को हेय एवं तिरस्कृत मानकर इसकी भर्त्सना की जाती रही है, परन्तु कोई भी इससे पार नहीं पा सका है ; बातें कितनी भी क्यों न हों . यह ऐसा रहस्य है, जिससे विरले ही पार पाने का प्रयास कर सके हैं और वह भी पूर्ण रूप से नहीं; अर्थात अभी भी यह यथावत बना हुआ है अपनी समस्याओं के साथ . काम नष्ट नहीं होता है, इसका विनाश संभव नहीं है, अतः इसकी समस्या बनी रहती है .दुर्गासप्तशती में कथानक के रूप में इसका उल्लेख मिलता है . माँ दुर्गा सभी दैत्यों को मार गिरती है , परन्तु महिषासुर ही एक ऐसा दैत्य है, जो मरता नहीं है, माता के चरणों में शरणागति को प्राप्त होता है . अतः काम का प्रतीक महिषासुर मारा नहीं, बल्कि भक्ति एवं प्रेम बनकर माँ का आश्रय एवं शरण पा गया .
वासना का समाधान केवल उसके रूपांतरण में ही निहित है, अन्यथा वासना जीवन के लिए गंभीर समस्या बन जाती है . इस समस्या का उचित समाधान न हो पाने के कारन ही इसकी भर्त्सना की गई है और रोचक बात तो यह है कि भर्त्सना करने वाले भी इससे निर्लिप्त नहीं हो सके हैं; क्योंकि इसके पार जा पाना आग के दरिया को पार करने जैसा है . कामवासना हमारी देह में रच-बस गई है . हमारी देह के प्रत्येक कोशिका में इसका अस्तित्व समां गया है . अतः यदि कोई कहता है कि मैंने काम पर विजय प्राप्त कर ली है तो संभवतः वह उससे परिचित नहीं है . जब तक देह कि प्रत्येक कोशिका का रूपांतरण न हो जाये, काम से विजय संभव ही नहीं और देह का रूपांतरण अभी तक की सभी साधनावों से गूढतम एवं विरल शाधना है . श्री अरविन्द ने रूपांतरण की शाधना पर सर्वप्रथम कार्य किया था और वे बहुत हद तक इसमें सफल भी हुए थे, परन्तु उन्होंने भी इसकी सम्पूर्ण सफलता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था .

Monday, August 23, 2010

Fundamentals of flight

You may post your Querries..by posting comments (As I explained "Fundamentals of Flight a basic introduction to aerodynamics " in the presentation Class on 23-08-2010.) I will be glad to solve your questions....

Wednesday, June 9, 2010

मगही लोकगीत....

हवा बहे रसे-रसे घुमड़इ कजरिया,
जिया कहे चल-चल पिया के नगरिया।

जहिया से सइँया मोरा गेलन विदेसवा,
आवे न अपने न भेजे कोई सनेसवा।

लिलचा के रह जाहे ललकल नजरिया.
जिया कहे चल-चल पिया के नगरिया।

जाड़ा जड़ाई गेलई सउँसे ई देहिया,
गरमी में सब जरई सबरे सनेहिया।

जियरा डेराय रामा छाय घटा करिया
जिया कहे चल-चल पिया के नगरिया।


Monday, May 10, 2010

Salute you "Maa"

प्रणाम करूँ तुझको माता

हे जननी जीवन दाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
तू सुख समृद्धि से संपन्न
निर्मलपावन है तेरा मन
तुझसे ही तो है ये जीवन
तुझसे ही भाग्य लिखा जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता

माँ की गोदि पावन-आसन
हम वार दें जिस पर तन मन धन
तू देती है शीतल छाया
जब थक कर पास तेरे आता
प्रणाम करूँ तुझको माता
इस विशाल भू मंडल पर
माँ ही तो दिखलाती है डगर
माँ ऐसी माँ होती न अगर
तो मानव थक कर ढह जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
हर जगह नहीं आ सकता था
भगवान हमारे दुख हरने
इस लिए तो माँ को बना दिया
जगजननी जग की सुख दाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
धरती का स्वर्ग तो माँ ही है
इस माँ की ममता के आगे
बैकुण्ठ धाम, शिव लोक तो क्या
ब्रह्म लोक भी छोटा पड़ जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
ऐसी पावन सरला माँ का
इक पल भी नहीं चुका सकते
माँ की हृदयाशीष बिना
मानव मानव नहीं रह पाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
क्यों मातृ दिवस इस माँ के लिए
इक दिन ही नाम किया हमने
इक दिन तो क्या इस जीवन में
इक पल भी न उसका दिया जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
माँ बच्चों की बच्चे माँ के
भूषण होते हैं सदा के लिए
न कोई अलग कर सकता है
ऐसा अटूट है ये नाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
माँ को केवल इक दिन ही दें
भारत की ये सभ्यता न थी
माँ तो देवी मन मंदिर की
हर पल उसको पूजा जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
बच्चों के दर्द से रोता है
इतना कोमल माँ का दिल है
बच्चों की क्षुधा शांत करके
खाती है वही जो बच जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
सच्चे दिल से इस माता को
इक बार नमन करके देखो
माँ के आशीष से जीवन भी
सुख समृद्धि से भर जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता

-सीमा सचदेव, बेंगलूरू (कर्नाटक)(Ek bahut hi umda kavyitri jisse main Hindyugm.com se jana)

Mother's day par...ise maine hindyugm.com se chepa hai...dubki lagayiye aap bhi

सफ़र

शाम थी, धुंधलका था, शान्ति थी पर इन सबका कोई मतलब नहीं था। मन में कोई स्पष्ट विचार नहीं रुक पा रहा था, रुक रहे थे तो सिर्फ़ गुंजलके,आशंकाएं और परेशानियां। बार-बार लगता था जैसे बारिश हो रही है पर ध्यान देने पर पता चलता कि कब की रुक चुकी है। बारिश से धुले घर और उनसे निकली अशोक की डालियां सुंदर लग रही थीं पर॰॰॰॰॰। कष्टों की परतों की चिकनाई ऐसी हो जाती है कि हर सुखद दृश्य फिसल-फिसल जाता है। और वाकई ऐसे सुंदर दृश्य हैं भी॰॰॰॰॰? बड़ी-बड़ी चमचमाती रोड लाइटें, बड़ी-बड़ी इमारतें और उन में चमकती रोशनियां। उनकी ऊंचाइयां सड़क पर चलते लोगों को कितना बौना बना देती हैं यह एहसास सबको होता है या सिर्फ़ उनको जो चलते वक़्त ऊपर देखते हैं ?

ऊंची-ऊंची रिहाइशी इमारतों में,माचिस के डिब्बों सी दीखती खिड़कियों में कितनी ही परेशानियां भेस बदल कर रहती हैं। होर्डिंग में दिखती ख़ूबसूरत लड़कियों की मुस्कान के पीछे भी ज़रूर कोई अनाभिव्यक्त कष्ट होगा जो ये हमेशा मुस्कराती रहती हैं। हर ख़ूबसूरत शै के पीछे अनेक दुख हैं। मां भी तो कितनी ख़ूबसूरत है पर उसके साथ चिपके हैं उसके आदि दुख जिसके बिना उसके चेहरे की कल्पना करने पर सिर्फ़ गोल ख़ाली आकृतियां दिखती हैं।

´´ अब मैं बचूंगी नहीं। ´´ आगे के शब्द सुनने के लिए वह वहीं नहीं रुका रह पाया। संवाद वही थे पर न जाने क्यों अब इनमें सच्चाई की धमक सुनाई देने लगी थी, आज सबसे ज़्यादा,सबसे ख़ौफ़नाक। पहले हताशा हुआ करती थी अब मौत के सामने थक कर किया गया आत्मसमर्ण॰॰॰॰॰॰।

´´ मुझे खोने से डर मत। जैसे मेरे होने की आदत पड़ी है वैसे मुझे खोने का भी अभ्यास हो जाएगा तुझे धीरे-धीरे। ´´ वह यह सोच कर कांप उठता था कि क्या यह धीरे-धीरे उतना ही धीरे-धीरे होगा जितना उसके होने की आदत॰॰॰॰॰॰॰?॰॰॰॰॰॰॰यदि ऐसा हुआ तो धीरे-धीरे मरता जाएगा वह जैसे उसके होने की आदत के साथ धीरे-धीरे जीता चला गया था।

कभी-कभी उसे लगता जैसे वह बचपन से ही दुखों और बीमारियों में रहने के लिए अभिशप्त है। अच्छे दुर्लभ दिन थोड़े से सपनों की तरह याद आते,जब वह मां के बक्से में देखता। पुरानी चिट्ठियां, छोटे हो गए उसके कुछ कपड़े, कुछ पुरानी तस्वीरें जिसमें सब मुस्कुराते दिखते,मां की एक पुरानी लाल साड़ी, कुछ डॉक्टरी रिपोर्टें, एकाध डायरियां और न जाने क्या क्या तो भरा था मां के उस अंधेरे कुएंनुमा बक्से में। जब वह उसमें झांककर देखता तो देखते-देखते काफी दूर निकल आता॰॰॰॰॰॰सालों पीछे तक। वह अपने खेतों में पहुंच जाता, जहां पिता अस्पष्ट आवाज़ में कोई गीत गाते हल चलाते रहते और मां दूर से पोटली में खाना लेकर आती दिखती। पूरा दृश्य उसके बचपन की ड्राइंग का पुस्तिका के सुखी परिवार वाले दृश्य जैसा लगता। वहां से वापस आने में उसे बहुत देर लगती। कई बार रास्ता भटकने के बाद जब वह संदूक से सिर उठाता तो पाता कि उसके चेहरे पर अचानक कांटेदार झाड़ियों की तरह पिता की दाढ़ी उग आई है।

इस घर के सभी कोनों में मां के बसने से पहले कहीं-कहीं पिता भी थे। एक दम तोड़ती चारपाई पर एक गुम होती सच्चाई की तरह जो शायद भीतर ही भीतर कहीं ये सोचते थे कि एक दिन उपर वाला उन्हें इस असाध्य बीमारी से छुटकारा दे देगा। उनकी बरसों की पूजा अर्चना और भक्ति से प्रसन्न होकर उनका जीवन बख़्श देगा ताकि वह अपने छोटे से परिवार को सुखी रख सकें। फिर वह इसी शहर में, सारे खेत उनके इलाज में बिक जाने के विकल्प में, एक और साथ वाला कमरा किराए पर लेकर रह जाएंगे, उसके साथ सटे रसोईघर को मिलाकर। कुछ महीने स्वास्थ्य लाभ लेकर बगल वाली फैक्ट्री में मज़दूरी कर लेंगे। धीरे-धीरे कुछ पैसे बचा कर एक छोटा सा घर ख़रीद लेने का नंगा स्वप्न एक भयावह परछाईं की तरह उनकी आंखों में तैरता रहता था। वह इस तरह के स्वप्नों से बहुत डरता था। जो स्वप्न आंखों में रहते हैं वे पूरे हो सकते हैं,जो चेहरे पर तैरने लगते हैं वे कभी पूरे नहीं होते। वे सुनहले होकर भी डरावने होते हैं। स्वप्न देखने वालों के काल होते हैं। उनकी छाया काली होती है।

पिता के बचने का विश्वास तो था। पिता को विश्वास था अपनी कठोर पूजा पर,उसे विश्वास था खेत का आख़िरी टुकड़ा बेच कर लाए गए उन नोटों पर, उन दवाइयों के ढेर पर, जिसकी गंध की वजह से उसे अपना घर किसी खैराती अस्पताल के अहाते सा लगता। यह विश्वास तब दरकने लगता जब पिता को खांसी आने लगती। बोलते-बोलते आती और वह उसे दबाने की कोशिश करने लगते। इस कोशिश में उनकी आंखें बाहर निकल आतीं और माथे पर असंख्य रेखाएं बन जातीं। चेहरा पीला हो जाता। वह शायद उसे हिम्मत दिलाने के लिए अपनी सिलसिलेवार खांसी रोकते पर इस दयनीय प्रयास से वह डर जाता और सनसे कटा रहता ताकि उन्हें कम बोलना पड़े या वह खुलकर खांस सकें।

पिता ने ख़ामोश होने से पहले भी एक निश्फल पूजा की थी। अंत समय में किसी चमत्कार की उम्मीद में उन्होंने आंखें बन्द कीं तो उनके चेहरे पर एक छोटे से घर का नक्सा झिलमिला रहा था। उसने महसूस किया कि यह उसका कोई जाना पहचाना घर है॰॰॰॰॰बहुत क़रीब से देखा हुआ। उसने डरते-डरते भीतर झांका। पिता बिल्कुल स्वस्थ बैठे मां से बातें कर रहे थे, ज़ोर-ज़ोर से हंसकर, बिना खांसी। उसे झांकते देखकर उन्होंने उसे हंसते हुए अंदर बुलाया। उसके अंदर जाने पर हमेशा से विपरीत पिता ने गले लगाया और उसे कहा कि वह उससे बहुत प्रेम करते हैं। वह रोने लगा और उसने भी उन्हें बहुत सारा अनाभिव्यक्त प्रेम करने की हामी भरी। जब वह उस घर से बाहर निकला तो उसे लगा कि पिता एक कमज़ोर पीली सी मुस्कराहट मुस्कराएं हों, उस घर को दिखाने की खुशी में। वह घर जो सिर्फ़ उनके चेहरे पर था और जिसमें उन पर पिता होने का कोई दबाव नहीं था। वह पिता के चेहरे से उस घर को साफ करने लगा जैसे किसी पुरानी आलमारी के जाले साफ कर रहा हो। चेहरे से वह तैरता घर साफ कर देने के बाद पिता का चेहरा बहुत विदारक हो गया था, खांसी रोकने के प्रयास में बहुत विकृत।

मां शायद इसलिए नहीं रोई थी कि सारे आंसू वही बहाता रहा था। कई दिनों तक। मां में बहुत हिम्मत थी। वह हमेशा समझाती,´´कमज़ोर मत बन। हिम्मत रख।´´ वह मां के चेहरे पर भी कुछ तैरता हुआ ढूंढ़ता था, घर या कोई सपना, पर वहां सिर्फ़ हिम्मत हुआ करती थी,अपार हिम्मत और एक छोटी सी आशा, बुझती हुई उम्मीद।

´´ मुझे वह लड़की बहुत पसन्द है। तू जल्दी से उससे शादी कर ले ताकि मेरी आंखों को बन्द होने से पहले तृप्ति मिल जाए। ´´ वह थोड़ा शरमा जाता। मां के बक्से में चांदी का एक कड़ा भी था जो सारी बिकती जाती चीज़ों के बीच भी अपना अस्तित्व क़ायम रखे था, मां की जिजीविषा की तरह।

मां ऐसी बातें करती तो कई भागों में बंट जाती थी, कई कोनों में। एक कोने में खाने की व्यवस्था के लिए पड़ोसियों के कपड़े सिलती हुई, कहीं उसकी पढ़ाई के लिए ढेर सारी साड़ियां बिखेरे उनमें फॉल लगाती हुई, कहीं थोक में ढेर सारे मोती लाकर बच्चों के लिए माला बनाती। उसके कई रूप थे। कहीं स्पष्ट, कहीं धुंधले। उन रूपों में सबसे स्पष्ट उसे पता नहीं बरसों पहले का वह रूप क्यों दिखता था जिसमें वह रंगीन साड़ी पहने ईश्वर की मूर्ति के आगे दिया जलाती छोटी सी घण्टी बजाती और सुनाती हर बार की सुनाई गई ईश्वर की महिमा का बखान करती वही कहानियां जिनपर उसे कभी विश्वास नहीं हुआ।

पूरी पूजा के दौरान वह हाथ जोड़े बैठे रहता। मां आरती करती और वह मां के चेहरे को निर्निमेष देखता रहता। उसे ईश्वर की सारी गढ़ी हुई कहानियों पर विश्वास होने लगता। मां के चेहरे पर दिए की लौ का तेज उतर आता।

ऐसा ही तेज उस लड़की के चेहरे पर भी था जो उसके साथ पढ़ती थी। उसने ग़ौर किया था कि मंदिर की मूर्तियों के सामने हाथ जोड़ कर आंखें बन्द करते समय उसके चेहरे पर मां जैसा तेज उभर आता है। दोनों कॉलेज की छुट्टी के बाद साथ-साथ घूमते उस सुनसान रास्ते पर निकल जाते जहां क़ब्रिस्तान था और हवा चलने पर सर सर की आवाज़ आती थी। लड़की ने एक दिन चलते-चलते उसका हाथ पकड़ लिया था और उसके कंधे पर सिर रख दिया था। उसकी आंखों में पता नहीं क्यों नमी सी छा गई थी और लड़की का चेहरा पानी में देखे जा रहे दृश्य सा लगा था।

´´ तुम्हारे साथ मुझे बहुत अच्छा लगता है। ´´ लड़की का सिर फिर से उसके कंधे पर टिक गया था।
´´ तुम मेरी मां जैसी लगती हो। ´´ वह बोलते हुए समय के जालों में उलझ कर कहीं दूर चला गया था। लड़की ने इस भ्रम के निवारण के लिए कि यह बात उसने उसी से कही है या किसी और से,सिर उठाकर देखा और हंस कर कहा था, ´´ तुम पागल हो। ´´ उस दिन वह बहुत खुश था।

लड़की हाथ देखना जानती थी। उसकी हथेलियों को जब वह अपनी हथेलियों में भर लेती तो उसकी आंखें बड़ी परेशान होतीं। वह कभी इधर उधर देखतीं,कभी लड़की की आंखों से मिल जातीं और कभी दूर कहीं क्षितिज पर टंग जातीं।

´´ तुम किसी से बहुत प्यार करते हो। ´´ वह रेखाओं में देखती हुई बोली।

´´ मैं॰॰॰॰॰॰॰॰वो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰। ´´ उसकी आँखें क्षितिज पर टंग गईं।

´´ पर तुम्हारी रेखाएं बता रही हैं कि तुमने उसे अभी बताया नहीं है। है न॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰? ´´

´´ हां॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰। "

´´ तो बता दो उसे। तुम्हार लकीरें बता रही हैं कि वह लड़की भी तुमसे प्यार करती है।"

वह पाता कि दूर क्षितिज पर जहां उसकी आंखें टंगी हैं, वहां डूबते सूरज की लालिमा लेकर एक चेहरा बन रहा है जो उसे देखकर मुस्करा रहा है। उस चेहरे पर ढेर सारी रेखाएं हैं जो उसके हाथों की रेखाएं हैं। वह कुछ पलों के लिए अपनी हथेलियों से अपने चेहरे को ढक लेता और पाता कि उसकी आंखें कुछ नम सी हो गई हैं।

´´ मेरा बेटा बहुत भावुक है। ´´ मां अक्सर आने जाने वालों और परिचितों, पड़ोसियों को बताती। वह सुनकर थोड़ा दुखी होता।

´´ तुम बहुत भावुक हो। भावुक लोग कमज़ोर हो जाते हैं। तुम हिम्मती बनो। ´´ वह मां की इच्छाओं के अनुरूप बनना चाहता था। वह मां को बहुत प्रेम करता था।

वह उस लड़की से भी प्रेम करने लगा था। वह उसके साथ देर तक बैठा रहता और उसकी बातें सुनता। लड़की उन दिनों कुछ ज़्यादा बातें करने लगी थी।

"मां की तबियत बिगड़ती ही जा रही है। सारी दवाइयां बेअसर हो रही हैं। मैं उसके बिना नहीं रह सकता। ´´

ऐसी बातें सुनकर लड़की बोलना बंद कर उसका सिर अपने कंधे पर टिका लेती और उसके घुंघराले बालों में उंगलियां फेरने लगती। एक पेड़ की डाल नीचे झुककर गुलाब के पौधे को सहलाने लगती जिसके आस-पास ढेर सारी तितलियां उड़ रही होतीं। वह लड़की के मौन में और अपने बालों में उड़ रही उंगलियों में सुनता,`` तुम घबराओ मत। मैं हूं न तुम्हारे साथ। ``

`` मैंने नौकरी खोजने की कितनी कोशिशें कीं॰॰॰॰॰॰॰॰। अब कुछ कमा कर मां को कुछ सुख देना चाहता हूं। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे लिए होम कर दी पर मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की। `` वह अपने मौन के ज़रिये लड़की के मौन से संवाद करता।

`` तुम अपनी लड़ाई में हमेशा मुझे अपने साथ पाओगे। `` लड़की उसके मौन का जवाब अपनी आंखों से देती। वह भी एक ग़रीब परिवार से थी और कठिन हालात में अपनी पढ़ाई जारी रखे थी। उसे अपना और लड़की का दुख एक बिरादरी का लगता।

उस दिन उनके एक सहपाठी का राजस्व सेवा में चयन हो गया था और वह जाने से पहले सबको कुछ न कुछ उपहार दे रहा था। उसे एक क्रूर उपहार के रूप में चमड़े का एक सुंदर बटुआ मिला। लड़की के लिए सहपाठी ने जेब से सोने की एक शानदार चेन निकाली और उसके गले में पहनाते हुए कहा था, `` इसे मंगलसूत्र मानना और मेरे लौटने तक मेरा प्रेम सम्भाल कर रखना। `` लड़की ने एकबारगी उससे नज़रें मिलाईं और फिर चेन की तरफ देखने लगी थी। सहपाठी ने भरपूर प्यार से उसके चेहरे पर हाथ फिराते हुए कहा, `` अपना ध्यान रखना। ``

" और तुम भी अपना। `` लड़की बोली थी।

वह कुछ देर तक उस कब्रिस्तान में अकेला बैठा रहा था जहां हवा चलने पर सर-सर की आवाज़ आती थी। रोना नहीं चाहता था क्योंकि उसे हिम्मती बनना था। लड़की से उसने कुछ नहीं कहा क्योंकि वह मौन की भाषा का कायल था। शब्दों में उसे कभी कोई ख़ास वज़न महसूस नहीं होता था।

`` जाने दे। भूलने की कोशिश कर उसे। तुझे चाहने वाली बहुत लड़कियां आएंगीं। तू हीरा है। उसे याद कर एक आंसू भी मत बहाना। तुझे कमज़ोर नहीं होना। `` मां कितनी हिम्मती है,उसे आश्चर्य होता। वह कमज़ोर नहीं बनना चाहता था। उस लड़की के बारे में सोचकर वह एक बार भी नहीं रोया।

`` मेरे मर जाने पर घबराना मत, हिम्मत से काम लेना। बगल से पड़ोसियों को तुरंत बुलवा लेना। मुझे चारपाई से नीचे उतार कर तुरंत चारपाई उल्टी करके खड़ी कर देना। फिर सोचना कि किन-किन रिश्तेदारों को उसी समय बताना है और किसे बाद में। घबराना बिल्कुल नहीं। अब तू बच्चा नहीं है। रोना तो बिल्कुल मत।

"वह यूं ही निरुद्देश्य टहलते उंची-उंची इमारतों से अपने बौनेपन को नापता जब घर पहुंचा तो घर में घुप्प अंधेरा था। उसने मां को आवाज़ दी, `` मां,मोमबत्ती बुझ गई क्या ?``

ज़ाहिर है मोमबत्ती बुझ चुकी थी पर कोई आवाज़ न पाकर उसने माचिस टटोलते हुए फिर पुकारा, `` मां॰॰॰॰॰ये मोमबत्ती कैसे बुझ गई मां ?``

उसने दूसरी मोमबत्ती जलाई। पहली गल कर ख़त्म हो गई थी। शायद वह सड़कों पर देर तक घूमता रहा था।

`` मां॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰माँ••••••••। `` उसने कई बार पुकारते चिल्लाते लगभग मां को झिंझोड़ दिया पर पूरा कमरा निश्चल था सिर्फ़ मोमबत्ती की लौ को छोड़कर जो बाहर से आती हवा से हिल रही थी।

`` मांSSSSSSSSSSSSS॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰। `` वह हताश सा ज़मीन पर ढेर हो चुका था। आंखों में नमी सी आ गई थी और सारे दृश्य पानी में डूब कर देखे जैसे लग रहे थे। एक झटके में सैकड़ों दृश्य आकर चले गए और आंखों के सामने अंधेरा छा गया। लगा जैसे पेट में कुछ खौलते-खौलते कलेजे तक आ गया है और यदि उसने मुंह खोला तो झटके से बाहर आ जाएगा। कुछ भी हो, उसे रोना नहीं था। उसे मज़बूत बनना था। वह बच्चा नहीं था। धीरे से उठा और मां के बक्से की टेक लगा कर खड़ा हो गया। मां को कमज़ोरों से घृणा थी। उसे पड़ोसियों को बुलवाना था। मां को नीचे उतरवाना था। चारपाई को उल्टा खड़ा करना था। रिश्तेदारों को सूचित करना था। उसे बहुत कुछ करना था पर उसे रोना नहीं था। उसे मज़बूत बनना था। वह धीरे-धीरे अपने कमज़ोर मन पर क़ाबू कर रहा था। उसने जबड़े भींच कर एक लम्बी सांस ली और मां की बात रखते हुए अपने आप को कुछ देर में संयत कर लिया। यह वाकई मुश्किल था पर उसने थोड़ी देर में खुद को बड़ा बना लिया।

`` सुन बेटा। ज़रा एक गिलास पानी दे देना। `` मां के बोलने पर वह अचानक चिहुंक उठा था और बाहर से आती हवा से मोमबत्ती की लौ इतनी तेज़ी से कांपी थी मानो बुझ जाएगी।

`` मां॰॰॰॰॰॰॰॰॰तु॰॰॰॰तुम॰॰॰॰मैं॰॰॰॰॰॰॰॰॰मुझे॰॰॰॰॰॰। `` उसे पता नहीं चल पा रहा था कि वह भ्रम में है या यथार्थ में।

`` इस स्थिति में कभी-कभी ऐसा हो जाता है रे। ऐसी बेहोशी जैसी नींद आती है कि॰॰॰॰॰॰॰॰॰। पानी दे और मेरी दवाइयां भी उठा देना। ``

वह पानी और दवाइयां देकर खटिए के पास बैठ गया। उसकी आंखें तेज़ी से झपक रही थीं और जबड़े भिंचते जा रहे थे। होंठ तिरछे होने लगे थे और वह सीधे रखने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा था। मां ने थोड़ा पानी पहले पिया। दवाई खोलकर खाते हुए मां ने ऐसे ही पूछ लिया, `` क्या हुआ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰? ऐसे क्या देख रहा है ? ``

बदले में वह खटिए की पाट से सिर टिकाकर छोटे बच्चे की तरह रोने लगा।

Thursday, March 18, 2010

How Times changes???
कल जब हम छोटे थे और कोई हमारी बात समझ नहीं पता था,तब सिर्फ एक हस्ती थी जो हमारे टूटे फूटे अल्फांज भी समझ जाती थी और आज हम उसी हस्ती को ये कहते हैं कि आप नहीं जानती, आप नहीं समझ पाएंगी, आप कि बातें मुझे समझ नहीं आती,... हो गयीं अब आप खुश!!!!!
Respect this Honourable personality before the Companionship ends।"It's tribute to our lovely Mother"
सख्त रास्तों में भी आसान सफ़र लगता है
ये मुझे "माँ" कि दुआओं का असर लगता है ,
एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई जब
मैंने एक बार कहा था
"माँ" मुझे डर लगता है ......
Hey friends let me know???what u guys think.

Monday, March 15, 2010

बचपन में तांका-झांकी.....

I want 2 go back 2 the time when "Innocence" was "Natural",When "Getting high" meant "On a swing",When "Drinking" Meant "Rasna Orange",When "Dad" was the only "Hero",When "Love" was "Mom's hug" when "Dad's shoulder" was "The highest place on earth",When ur "Worst enemies" were "ur siblings", when the only thing that could "Hurt" were "Bleeding knees", when the only things broken" were "Toys"& when "Goodbyes" only meant "Till tomorrow" Life has changed a lot and worst thing is those times will never come back ......Dedicated to Mahhhhhh frnds.